
रामायण में एक कथा है, जो हम सभी ने बचपन में हिंदी की पुस्तक में भी पढ़ी है। इसमें बताया गया है कि राजा दशरथ के तीन रानियां थी। लेकिन संतान न होने कारण राजा अत्यधिक दुखी थे। तब गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से राजा दशरथ ने श्रृंग ऋषि को पुत्रेष्टि यज्ञ करने के लिए आमंत्रित किया। यज्ञ के संपन्न होने पर हवनकुंड से सोने का कटोरा लेकर अग्निदेव प्रकट हुए। स्वर्ण के इस कटोरे में दिव्य खीर भरी हुई थी। अग्निदेव ने राजा दशरथ से कहा ‘राजन, देवता आप पर प्रसन्न हैं। यह दिव्य खीर अपनी रानियों को खिला दीजिए, इससे आपको 4 पुत्रों की प्राप्ति होगी।’ इतना कहकर अग्निदेव अंतर्धान हो गए।
राजा दशरथ ने खीर सबसे पहले महारानी कौशल्या को दी, उसके बाद सुमित्रा और कैकयी को। सबसे अंत में प्रसाद मिलने के कारण देवी कैकयी ने क्रोधित होकर राजा दशरथ से कठोर शब्द कहे। उसी समय भगवान शंकर के प्रेरणा से एक चील वहां आई और कैकेयी की हथेली से प्रसाद उठाकर अंजन पर्वत की तरफ ले गई। अंजन पर्वत पर माता अंजनी तपस्या में लीन थीं। चील ने प्रसाद का कटोरा ले जाकर अंजनी देवी के हाथ पर रख दिया। इस प्रसाद को ग्रहण करने से देवी अंजनी भी राजा दशरथ की तीनों रानियों की तरह गर्भवती हुईं।




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