Monday, 10 August 2026

 
 
पब्लिकयूवाच - ऐसी घटनाएं हमारे आपके साथ अनेको बार हुई होगी भले ही आप पहले न हो लेकिन दूसरे तीसरे पांचवे दसवें तो जरूर रहे होंगे। आप सड़क पर बाइक या कार से किसी भी साधन से जाते हुए रुक जाइये और किनारे लगे बिजली के खम्भे को देखना शुरू कर दीजिए. कुछ देर में कोई और पक्का रुकेगा वह भी देखेगा धीरे-धीरे एक एक करके दर्जनों लोग रुक कर ऊपर उसी खम्भे को देखने लगेंगे।भले ही किसी को कुछ समझ नहीं आये। किसी ने दूसरे से पूछ लिया कि भाई क्या है तो वह जबाब देगा पता नहीं कुछ तो है ऊपर यह सारा क्रम काफी देर चल सकता है। यह मनुष्य की कौतूहल वाली प्रवित्ति का नतीजा है।
कभी कभी आप घर मे महिलाओं को अचानक किसी अजीबोगरीब क्रिया कलाप में सलंग्न देखते है मसलन पीपल के पेड़ पर सात दिया जलाना या फिर सुहागन को पांच बिंदी दान देना या जिसके जितने बच्चे है उतना फल खाओ या दान करो ।पूछने पर पता चलता है फला दीदी ,भाभी, बुआ ,मामी का फोन आया था वह बता रही थी ऐसा करना है नही तो वो अपशगुन होगा सब कर रहे हैं मैं भी कर लेती हूं टोका टाकी मत करना इस प्रकार के तमाम प्रपंच हिंदुस्तान के कोने कोने में वर्षो से चल रहे है ।हम सबके लिए यह सामान्य बात है।
यह किस्सा मैं आप सबको इसलिए बता रहा हूं कुछ दिन पहले कोरोना से बचाव के लिए देश भर ने ,थाली पीटा, मोमबत्तियां जलाई ।कुछ लोग इसे मोदी जी के आह्वान का प्रभाव मान बड़े खुश हो रहे मोदी जी ने आह्वान किया देश ने उनका समर्थन किया यह उनका जनाधार है।अरे भइया जिस देश में समान्य अफवाह पर लोग गणेश जी को दूध पिलाने लोग मंदिरों में दूध ले लाईन लगा लेते है जिस देश मे महिलाएं बिना किसी ठोस जानकारी के टोटके कर लेती है यह सोच कर ऐसा करने में हमारा जाता क्या है ।जहाँ लोग एक आदमी के सड़क पर ऊपर देखते देख कर कौतूहल में खुद भी ऊपर देखने लगते है उस देश मे यदि प्रधानमंत्री नेशनल टीवी पर दैवीय आपदा के समय कोई टोटका करने का आह्वान करते है तो लोगो को उसको मानना सामान्य बात है। इस घटना को नेता की महिमा और प्रभाव बता कर मगन रहने वाले जान ले यह संक्रमण काल नोटबन्दी के समान नही है कि लोग पर पीड़ा से खुश होंगे हमारा क्या गया ।पैसे वालो का गया जिसने जमा कर के रखा था उसका गया ।कोरोना महामारी है बीमारी अमीर गरीब देख कर नही आती ।वैसे भी कोरोना की मार में देश का गरीब जादा बेहाल है ।
लॉक डाउन से उनको कोई फर्क नही पड़ने वाला जो साधन संपन्न है या जिनके पास घर मे खाने पीने की कुछ महीने कोई दिक्कत नही आने वाली ।इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन पर पड़ रहा जिन्हें रोज कमाना है तभी उनके घरों में चूल्हे जल पाते हैं जब वे दिन भर में कुछ कमा लें। सब्जी फल का ठेला लगाने वालों को छोड़ दिया जाय तो आज सड़क पर व्यवसाय करने वाला तथा मजदूरी कर जीवन यापन करने वाला हर आदमी बेबस और मजबूर है ।उसे या सरकार का सहारा चाहिए या फिर समाज के समृद्ध तबके की मदद की ।इस अनिश्चितता के माहौल में समाज मे भी बहुत बड़ा तबका मदद की स्थिति में खुद को नही पाता , उसे खुद नही मालुम कि वह अपने परिवार की व्यवस्थाओं को कितने दिन पूरी कर पायेगा।अपनी तमाम संवेदनाओं के वावजूद स्वम को असहाय पा रहा है। लॉक डाउन के 21 दिन बाद भी चलने पर दिहाड़ी मजदूरी से ऊपर जो लोग छोटी मोटी नौकरियां दुकानों ,छोटे कार्यालयों में काम करते है छोटे निजी संस्थानों में काम करते है , भृत्य मुंशी आदि की नौकरी कर होने वाली आमदनी से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते है उनके पास भी अब पैसे और राशन दोनो खत्म होने को है।
इस वर्ग ने भी अपने प्रधानमंत्री के आह्वान पर अपने परिवार की कुशलता के लिए थाली भी पीटा ,और दिया भी जलाया रैलियां निकलने पर जिंदाबाद के नारे भी लगाया अब जरूरत है प्रधानमंत्री भी थाली मोमबत्ती के प्रपंच से ऊपर उठ कर इन निम्न और मध्यम तबके के लोगो की परेशानियों को दूर करने की कवायद करें। एक शहर से दूसरे शहर एक राज्य से दूसरे राज्य जाने की आपाधापी शौकिया नही थी ।इसके पीछे भूख भय और असुरक्षा की भावना थी ।हजार पांच सौ किलोमीटर पैदल चलने निकलने वाले लोगो ने इसे अंतिम रास्ते के रूप में चुना था।
निसन्देह यह एक वैश्विक महामारी है इससे दुनिया के तमाम ताकतवर देशों मे कोइ नही बचा है।भारत मे इस महामारी ने जनवरी में दस्तक दिया और काफी धीरे धीरे विस्तार किया कह सकते है कि कोरोना ने भारत को बचाव का पूरा अवसर दिया था ।दुर्भाग्य से हमने इस अवसर का सदुपयोग नही किया ।प्रधानमंत्री जी अमीरों को हवाई अड्डो पर रोकने का साहस जब दिखाना था तब तो आप इच्छा शक्ति सुसुप्त थी।यदि कुछ लाख लोगों को आइसोलेशन में रखने का कदम उठाया गया होता तो आज देश के लिए 135 करोड़ लोगों को घरों के अंदर रहने की नौबत नहीं आती और न ही देश के करोङो लोगो को भूख से लड़ने की जद्दोजहद करने की मजबूर होना पड़ता।फरवरी में वेंटिलेटर और पीपीई जैसे आवस्यक चिकित्सीय उपकरणों के निर्यात की अनुमति देने के अदूरदर्शी निर्णयों का जबाब भी कालांतर में जनता को देना ही पड़ेगा।

 
 
 
 
आतंक की राह पर चलते रहने को आमादा पाकिस्तान यही जाहिर कर रहा है कि वह भारत समेत दुनिया के लिए सिरदर्द बना रहेगा ।
सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का यह कथन पाकिस्तान के आतंकी चरित्र को ही बयान करता है कि बालाकोट में आतंकियों के ठिकाने को फिर से सक्रिय कर दिया गया है। यह वही आतंकी ठिकाना है, जिसे पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने हवाई हमले के जरिए ध्वस्त किया था। माना जाता था कि इस हवाई हमले के बाद पाकिस्तान के होश ठिकाने आ जाएंगे, लेकिन अब पता चल रहा है कि ऐसा नहीं हुआ। इसे देखते हुए यह सर्वथा उचित है कि सेना प्रमुख ने बिना किसी लाग लपेट कहा कि अगली बार बालाकोट से भी बड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पाकिस्तान से कम से कम पांच सौ आतंकी भारत में घुसने की फिराक में हैं। इसका मतलब है कि पाकिस्तान आसानी से मानने वाला नहीं है। कश्मीर पर उसके गर्जन-तर्जन से यह जाहिर भी हो रहा है। वह इस तरह बौराया हुआ है जैसे जम्मू-कश्मीर पर वही शासन कर रहा हो। कश्मीर पर पाकिस्तान की बौखलाहट यही बताती है कि कोई देश किस तरह दिवास्वप्न से ग्रस्त होकर खुद को बर्बादी के रास्ते पर ले जा सकता है। उसे सिर्फ यही मुगालता नहीं था कि मुस्लिम जगत की ठेकेदारी उसके पास है, बल्कि वह इस सनक से भी ग्रस्त था कि एक दिन कश्मीर उसका होगा। वह इस सनक का शिकार तब है, जब उसकी अर्थव्यवस्था रसातल में है और उसे एक तरह से भीख मांग गुजारा करना पड़ रहा है।
हालांकि पाकिस्तान के आम लोग यह जान-समझ रहे हैं कि विश्वव्यापी बदनामी के कारण दुनिया उस पर ध्यान नहीं दे रही है, लेकिन पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और खासकर उसकी सेना को शायद इसकी परवाह नहीं। हैरानी इस पर है कि क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान सच को स्वीकार करने के बजाय अपनी आतंकपरस्त सेना की कठपुतली बनना पसंद कर रहे हैं। पाकिस्तान एक ओर खुद को आतंक पीड़ित बताता है और दूसरी ओर किस्म-किस्म के आतंकियों को पालने-पोसने का भी काम करता है। उसकी इसी दुष्प्रवृत्ति को पिछले दिनों ह्यूस्टन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और साथ ही एक तरह से विश्व समुदाय के समक्ष इस सवाल के जरिए बयान किया कि आखिर 9/11 और 26/11 के आतंकी हमलों के साजिशकर्ता कहां पाए गए? आतंक के रास्ते पर चलते रहने पर आमादा पाकिस्तान यही जाहिर कर रहा है कि वह अभी भारत समेत दुनिया के लिए सिरदर्द बना रहेगा। हालांकि दुनिया पाकिस्तान का रोना-धोना सुनना पसंद नहीं कर रही है, लेकिन उसकी हरकतों को देखते हुए भारत को उससे नए सिरे से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए। यह तैयारी निर्णायक ही होनी चाहिए।

 
नेशनल मेडिकल कमीशन बिल पर लोकसभा की मुहर के साथ ही यह उम्मीद बढ़ गई है कि जल्द ही राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का गठन होगा। इस आयोग के गठन का एक बड़ा उद्देश्य भारत को विश्वस्तरीय चिकित्सा शिक्षा का केंद्र बनाना है। मेडिकल कमीशन बिल को कानूनी स्वरूप दिए जाने का इंतजार इसलिए हो रहा है, क्योंकि ऐसा होने पर ही उस मेडिकल काउंसिल से छुटकारा मिल सकेगा, जिसके बारे में इस नतीजे पर पहुंचा गया था कि वह एक अक्षम और भ्रष्टाचार से ग्रस्त संस्था है।
हालांकि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के कुछ प्रावधानों का विरोध भी हो रहा है, लेकिन ऐसा तो करीब-करीब हर विधेयक के मामले में देखने को मिलता है। इतने बड़े देश में ऐसे किसी विधेयक का निर्माण मुश्किल ही है, जिसके सभी प्रावधानों पर हर कोई सहमत हो सके। देखना है कि सरकार इस मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करती है या नहीं कि मेडिकल छात्रों को एक्जिट परीक्षा देने का अवसर एक से अधिक बार मिले? जो भी हो, उचित यही है कि विपक्षी राजनीतिक दल यह समझें कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के गठन का समय आ गया है। इस आयोग के जरिए केवल चिकित्सा शिक्षा की विसंगतियों को ही दूर करने में मदद नहीं मिलेगी, बल्कि चिकित्सकों और खासकर विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को दूर करने का लक्ष्य भी पूरा किया जा सकेगा। फिलहाल यह एक कठिन लक्ष्य दिख रहा है।
चिकित्सा शिक्षा और शोध में सुधार की पहल एक ऐसे समय हो रही है, जब शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में भी सुधार की कवायद चल रही है। नई शिक्षा नीति के मसौदे को इसी सिलसिले में देखा जाना चाहिए। वर्तमान में शिक्षा के हर स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह समय की मांग है कि शिक्षा संबंधी कोई ऐसा राष्ट्रीय आयोग भी बने जो विभिन्न् क्षेत्रों के शिक्षा संस्थानों के तौर-तरीकों और मानकों में एकरूपता लाने का काम कर सके। ऐसा कोई आयोग ही विभिन्न् मंत्रालयों से जुड़े शिक्षा संस्थानों को समान धरातल पर लाने और उनकी गुणवत्ता को एक स्तर प्रदान करने का काम कर सकता है। यह आयोग मानव संसाधन विकास मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के शिक्षा संस्थानों में समन्वय बैठाने का भी काम कर सकता है। ध्यान रहे कि आज की जरूरत केवल यही नहीं है कि हमारी चिकित्सा शिक्षा विश्वस्तरीय हो, बल्कि यह भी है कि तकनीक, कृषि, प्रबंधन आदि से जुड़ी शिक्षा का भी स्तर सुधरे। यह जरूरत इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि सरकार इस कोशिश में है कि विदेशी छात्र भी भारत आकर उच्च शिक्षा ग्रहण करें।

ममता को नीति आयोग की रीति-नीति से शिकायत हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उसकी बैठकों में शामिल होने से इनकार करें। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नीति आयोग की आगामी बैठक में शामिल होने से इनकार करके यही साबित किया कि वह अभी भी चुनाव के दौर वाली मानसिकता से मुक्त नहीं हो सकी हैं। शायद उन्हें इसकी परवाह नहीं कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करके वह पश्चिम बंगाल के हितों की ही अनदेखी करेंगी। यह वही ममता बनर्जी हैं, जो एक समय अपने नेतृत्व वाले राजनीतिक मोर्चे का नाम संघीय मोर्चा रख रही थीं, ताकि राज्यों के अधिकारों को प्राथमिकता देती हुई दिख सकें, लेकिन आज वह संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ खड़ी होना पसंद कर रही हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें जनादेश को स्वीकार करने में मुश्किल हो रही है। वह उन चंद मुख्यमंत्रियों में शामिल थीं, जिन्होंने मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार किया। यह भी ध्यान रहे कि वह चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को न केवल प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर रही थीं, बल्कि उनसे फोन पर बात करना भी जरूरी नहीं समझ रही थीं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह कई केंद्रीय योजनाओं को लागू करने से भी इनकार करती रही हैं। इनमें आयुष्मान भारत योजना भी है और देश के पिछड़े जिलों के विकास की योजना भी।
राजनीतिक खुन्न्स में जनकल्याण और विकास की केंद्रीय योजनाओं से अपने राज्य को वंचित रखना सस्ती राजनीति के अलावा और कुछ नहीं। यह एक तरह की जनविरोधी राजनीति भी है। मुश्किल यह है कि ऐसी सस्ती और जनविरोधी राजनीति का परिचय अन्य अनेक दल भी देते रहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि बीते दिनों द्रमुक नेताओं ने हिंदी थोपे जाने का हल्ला मचाकर किस तरह सस्ती राजनीति का प्रदर्शन किया। हिंदी के नाम पर द्रमुक और कुछ अन्य दलों के नेता किस तरह जनता को गुमराह कर रहे थे, इसका पता इससे चलता है कि तमिलनाडु उन राज्यों में प्रमुख है, जहां हिंदी को पठन-पाठन का हिस्सा बनाया गया है। बहुत दिन नहीं हुए, जब आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीबीआई को राज्य के मामलों की जांच करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। आंध्र प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल ऐसा करने वाला दूसरा राज्य बना था। आखिर ऐसे मनमाने फैसले लेने वाले नेता किस अधिकार से संघीय ढांचे को मजबूती देने की जरूरत जता सकते हैं? पता नहीं ममता बनर्जी चंद्रबाबू नायडू के राजनीतिक पराभव से कोई सीख लेंगी या नहीं, लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री को यह शोभा नहीं देता कि वह संकीर्ण राजनीतिक हितों को इतनी अहमियत दे कि राज्य के हित पीछे छूटते हुए दिखें। लोकसभा चुनावों के समय राहुल गांधी की तरह नीति आयोग को खत्म करने का वादा कर रहीं ममता बनर्जी को इस आयोग की रीति-नीति से शिकायत हो सकती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उसकी बैठकों में शामिल होने से इनकार करें। नीति आयोग को निष्प्रभावी संस्था बताते हुए उन्होंने योजना आयोग को बहाल करने की मांग की है। यह तय है कि ऐसी मांग करते समय वह इससे भली तरह परिचित होंगी कि ऐसा नहीं होने जा रहा है।
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